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अंत !

बदल गया, सब बदल गया..... हमारी गुलामी आज़ादी में बदल गयी। काल्पनिकता, सच्चाई में बदल गयी। और कई परिवर्तन जारी है । भाषा विदेशी हो रही है , इंसान हैवान हो रहा है। इंसान का इंसान को देखने का नजरिया बदल गया, परिवर्तन की आंधी में मौसम ने भी हुंकार भर ली... जमीन कंगाल है , और सूरज लाल है । कही बसेरे डूब रहे है तो कही पेड़ सूख रहे है ।ये बदलता रंग मुझे तो सोचने पर मजबूर कर देता है...आखिर हम कितने परिवर्तनशील है। बचपन में मै गिरगिट को बहुत देर तक देखता रहता था, उससे पत्थर भी मारता था.... कि कभी न कभी ये रंग तो बदलेगा ,और मै इसी बात को लेकर रोमांचित रहता था। जब बड़ा हुआ तो खुद को देखा... और आज भी अचम्भित हु कि भला मै क्यो रंग बदलता हु । वो गिरगिट तो सिर्फ शिकार करने में इस कला का धनि था पर यहाँ हम तो महाधनी निकले ।

खैर छोडिये जब परवर्तन ही प्रकति का नियम है तो उसमें रहने वालो लोगो में परिवर्तन का होना स्वाभाविक बात है । हमारी प्रकति को बड़ा ही संतुलित बनाया गया है.... और संतुलन का होना बहुत जरुरी भी है । जन्म और फिर मृत्यु ये एक संतुलन है। पहले के समय में दानव आपदाए लाते थे और उनका अंत करने क लिए भगवान् स्वं उनसे युद्ध करते है । लेकिन आज ना तो दानव दिखते और ना ही भगवान् । बीमारिया दानव की तरह आपदाए लाती है और हां- हां कार मचाती है और भगवान् इंसान को ज्ञान दे कर इन बीमारियों से लड़ने की दवा की खोज करवा लेते है इस तरह फिर से स्तिथि संतुलित हो जाती है ।

मेरे पिता बहुत दूरदर्शी है इस बात का पता मुझे तब चला जब मैंने कई लोगो द्वारा पूछे गए प्रशन - "तुम्हारा नाम शासक क्यों रखा "! को अपने पिता से ही पूछा। तो उन्होंने उत्तर दिया कि बेटा भारतीय सभ्यता में ऐसी मान्यता है कि जिसका जो नाम रखा जाता है उस नाम का प्रभाव उसके जीवन में पड़ता ही है । और अगर ऐसा सच हुआ तो मै तो तुम्हे शासक बनता ही देखना चाहता हु । यही दुर्दर्श्ता का गुण मेरे पास भी आ गया । और जब मैंने अपनी दूरदर्शी नजरे प्रकृति पे डाली तो मै भयभीत हो उठा , मुझे अंत अपनी आखो के सामने दिख रहा था । क्या आपको अंत नहीं दिखा रहा है ? ऐसा नहीं है कि आप दूरदर्शी नहीं है ....अच्छा बताईये १, ३, ६ ,१०, १५, ? , तो इस श्रेणी का अगला पद क्या होगा ? मुझे आशा है कि आपको उत्तर मिल ही गया होगा । आपने इस श्रेणी में परिवर्तन के क्रम जान कर, आगे आने वाले पद को पता कर लिया है ये आपकी दूरदर्शिता ही है ।

तो क्या आपने अपनी प्रकृति में परिवंतन के क्रम को नहीं जाना है, या फिर जानते हुए भी अनजान बैठे हो । क्या आपको इस धरती का अंत होते नहीं दिखाई दे रहा है ? अब आप ही इन इशारों को समझो - एक तरफ ग्लेशियर पिघल रहे है , पानी का दवाब बढ़ रहा है , सुनामी आ रही है , पूरी दुनिया बाढ़ कि चपेट है । दूसरी तरफ जल बचायो अभियान चलाये जा रहे है , पीने को पानी नहीं मिल रहा है ,पानी को खारीदा जा रहा है ! आखिर ये कैसी विडम्बना है पानी है तो खतरा है और पानी नहीं तो भी । इससे एक बात तो इश्पष्ट है कि हमारा अंत पानी से ही होगा या तो धरती से पानी ही ख़तम हो जाएगा या फिर ये धरती ही जलमग्न हो जायेगी ।
यहाँ तक कि कई फिल्मो द्वारा ऐसी आपदाए दर्शायी भी जा चुकी है । तो क्या बस ऐसे ही हमारा अंत हो जायेगा.....? उस संतुलन को क्या हुआ जो अभी तक हमारे साथ था .... क्या इस विनाश से बचने का कोई रास्ता नहीं है ? क्या भगवान् हमें इससे बचने का ज्ञान नहीं देगे ? कल रात मै इन्ही प्रश्नों के बारे में सोच रहा था तभी मुझे प्रकृति के इशारों से इनके हल मिल ही गए । हमें डरने कि जरुरत नहीं है क्यों कि भगवान् ने हमें इससे बचने का ज्ञान देना सुरु कर दिया है । अब आप कहेगे वो कैसे? अब आप ही बताइए- मंगल पर पानी और वायुमंडल कि खोज, चाँद पर भी पानी कि खोज । ये सब खोजे किस ओर इशारा कर रही है , क्या मंगल ही हमारी आने वाली भाविपीढ़ी के लिए नया घर होगा । यहाँ तक ही लोगो ने चाँद और मंगल में प्रोपर्टी लेना भी सुरु कर दिया है । जैसे जैसे विनाश समीप आता जायेगा और खोजे होती जाएगी और अंत में हम सभी इस धरती से पलायन कर लेगे... तभी संतुलन बना रह सकता है । अनंत काल से हमें पालने वाली इस धरती माँ कि गोद एक दिन सुनी हो जाएगी । मुझे तो समझ नहीं आ रहा कि मै आज खुश होयु कि हमारी पीढ़ी को नए गृह में रहने का मौका मिलेगा , या फिर इस धरती के अंत होने का दुःख मनायु।
मै , ना तो इस धरती के अंत को देखने तक जीवित रहूगा और ना ही मंगल में अपने नए घर का नक्शा बनाने के लिए । कर सकता हु तो सिर्फ "सोच " और वो यही है ।

धन्यवाद !!!


Comments

  1. ab pata chala tera naam shasak kyun hain..
    aur tune T.I.M.E ka hi question de diya..
    good job buddy!!
    its true, we should think over it...

    ReplyDelete

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